रविवार, 24 मई 2020

स्वतंत्रता सेनानी राजगुरु की जीवनी | Rajguru Biography in Hindi




राजगुरु (राजगुरु) का असली नाम शिवराम राजगुरु था पर वे क्रान्तिकारियो में राजगुरु के नाम से ही विख्यात थे। उनका जन्म कब और कहा हुआ था और उनके माता-पिता का क्या नाम था इस बातो का उल्लेख कही नही मिलता | उनके संबध में केवल इतना ही पता चलता है कि वे छात्र अवस्था में ही क्रांतिकारी दल में सम्मिलित हो गये थे और अपनी लगन एवं निष्ठा के कारण प्रमुख क्रांतिकारी माने जाने लगे थे।

राजगुरु (राजगुरु) दृढ़ चरित्र के व्यक्ति थे | धुन के बड़े पक्के थे | उन्हें जो कार्य सुपुर्द कर दिया गया था | उसे वे बड़ी निष्ठा के साथ करते थे | क्रांतिकारी दल में वे सबसे अधिक विश्वसनीय समझे जाते थे | राजगुरु योग्य और अनुभवी संघठन निर्माता थे | उन्होंने उत्तर प्रदेश, दिल्ली और पंजाब आदि राज्यों में क्रांतिकारी दल का संघठन बड़ी बुद्धिमता के साथ किया था | वे दल में स्वयं भूके रह जाते थे आत्म कष्ट उठा लेते थे अपने साथियों को कभी भूखा नहीं रहने देते थे - |

राजगुरु (राजगुरु) सरदार भगतसिंह के सबसे विश्वासपात्र थे | दोनों में मित्रता कब और कैसे स्थापित हुयी थी इसका ठीक-ठाक पता नहीं चलता है | कुछ लोगो का कहना है कि जिन दिनों भगतसिंह कानपुर में रहते थे उन्ही दिनों राजगुरु की उनसे भेंट हुयी थी धीरे धीरे उनकी मित्रता प्रगाढ़ हो गयी थी जिसके कारण भगतसिंह हर योजना में उन्हें अपने साथ रख रहे थे |


यद्यपि राजगुरु (राजगुरु) का नाम उत्तर प्रदेश के क्रान्तिकारियो में लिया गया था पर पहले उन्हें अधिक ख्याति प्राप्त नहीं हुयी थी | जिस घटना के कारण उनका नाम जन जन के होंठो पर छा गया था वह घटना लाहौर में सैंडर्स की हत्या की थी 1928 ई। आगमन साइमन कमीशन का भारत आगमन हुआ | कमीशन में सभी अंग्रेज सदस्य थे: कांग्रेस की ओर से कमीशन के बहिष्कार की घोषणा की गयी फलदाय आयोग जिस पर नगर में गया जुलुस और सभाओं द्वारा उसका बहिष्कार किया गया।


कमीशन जब लाहौर में गया तो वहा भी उसके बहिष्कार के लिए एक बहुत बड़ा जुलुस निकाला गया | जुलुस का नेतृत्व लाला लाजपतराय ही कर रहे थे | जुलुस जब स्टेशन पर पहुंचचा तो अग्रो ने उसका मार्ग रोक लिया | केवल इतना ही नहीं, जुलुस पर लाठी वर्ष भी जोड़ा गया | सैंडर्स के संकेत पर दो गोर सिपाहियों ने लालाजी पर भी वार किया | लालाजी की छाती में अंक आ गयी | उसी अंक के परिणामस्वरूप 8 नवंबर के दिन अस्पताल में उनका स्वर्गवास हो गया |


लालाजी के स्वर्गवास ने क्रांतिकारियों के रक्त में स्वभावता पैदा कर दी | लाहौर में दल की बैठक हुयी | बैठक में भगतसिंह, राजगुरु, आजाद और सुखदेव आदि सभी उपस्थित थे विचार-विमर्श के पश्चात सैंडर्स की हत्या करके लालाजी की मौत का बदला लेने का निश्चय किया गया | सैंडर्स की हत्या का कार्य भगतसिंह, राजगुरु और आजाद को सुपुर्द किया गया |

सैंडर्स की हत्या की योजना बड़ी बुद्धिमानी के साथ बनाई गयी थी | 15 दिसंबर 1928 का दिन था | शाम के चार बज रहे थे | सैंडर्स अपने ऑफिस से निकले और मोटर साइकल पर सवार होकर चल पड़े | कुछ ही कदम आगे बढ़ गए थे कि उस पर पंक्तियों की बौछार की गयी | लक्ष्य ठीक बैठा, वह मोटर साइकिल से लुढ़ककर धरती पर गिर पड़ा और प्राणश स्थापना हो गई | कहा जाता है कि गोलियां स्वयं भगतसिंह और राजगुरु ने चलाई थी | सैंडर्स के गिरते ही भगतसिंह, राजगुरु और आजाद भाग खड़े थे सिपाही चाननसिंह ने उनका पीछा किया पर गोलिया चलाकर उसे भी ढेर कर दिया गया |

तीनो वीर क्रांतिकारी मंडर्स की हत्या के पश्चात डीएवी कॉलेज के होस्टल में छिपाए जा रहे हैं कुछ क्षणों तक वहा रहने के पश्चात तीनो क्रांतिकारी अलग अलग दिशा में चले गए और अलग अलग स्थान पर जाकर छिप गए सैंडर्स की हत्या की खबर सारे नगर में बिजली की भांति फ़ैल गयी चारो ओर पुलिस दौड़ पड़ी | बड़े बड़े पुलिस अधिकारी घटना-स्थल पर जा पहुँचे | क्रांतिकारियों को बंदी बनाने के लिए जोरो से प्रयत्न किया किया जाने लगा


सारे नगर में गुप्तचरों का जाल बिछा दिया गया | सराय, होटल, और धर्मशालाओं की तलासिया ली गयी | गली-गली, मोड़-मोड़ पर पुलिस तैनात कर दी गयी गयी | स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर भी कड़ा पहरा लगा दिया गया, फिर भी क्रांतिकारी न तो पकड़े गए और न उनके संबध में कुछ टावर ही मिला। उधर भगतसिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आदि क्रांतिकारी लाहौर में अपने को सुरक्षित न पाकर वहा से निकल जाने की योजना बनाने लगे | अंत में बड़ी चतुराई और समझी के साथ लाहौर से निकल जाने की योजना बनाई गयी |


भगतसिंह पुलिस की आँखों में धुल झोंकने के लिए विदेशी साहब के वेश धारण कर कलकत्ता की गाडी में बैठ गए | दुर्गा भाभी उनकी स्मृति बनी हुई थी और राजगुरु बने थे चपरासी | इस तरह भगतसिंह और राजगूरु पुलिस की नज़र में धुल झोंककर लाहौर से बाहर निकल गए आजाद भी साधू का वेश धारण करके लाहौर से निकल गए थे | भगतिसिंह तो कलकता चले गए पर राजगुरु बीच में कही उतर गए | बाद में उत्तर प्रदेश में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया | सुखदेव को भी गिरफ्तार करके मिन्यावाली जेल में रखा गया था |


भगतसिंह और दत्त को सेंट्रल असेम्बली हाल में बम फेंकने के पश्चात पकड़े गए थे | पहले उन्हें दिल्ली जेल में रखा गया था फिर मियावाली जेल में भेज दिया गया था | जेल में क्रांतिकारियों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था | अत: उन्होंने 1931 के जून मॉस में अपनी मांगो को लेकर अनशन प्रारम्भ कर दिया अनशन 16 जून से शुरू होकर 3 सितंबर तक चला गया | भगतसिंह और सुखदेव आदि क्रांतिकारियों के साथ राजगूरु ने भी अनशन किया था |


राजगूरु (राजगुरु) परसंदर्स की हत्या के अभियोग के संबध में मुकदमा चला गया है | सुखदेव पर भी यही अभियोग था | भगतसिंह पर सैंडर्स की हत्या के अभियोग के साथ ही दिल्ली के बमकांड का भी अभियोग लगाया गया था मुकदमे में भगतसिंह और सुखदेव के साथ ही राजगुरु को भी फाँसी का दंड दिया गया था फांसी के लिए 23 सितंबर के दिन निश्चित किया गया था पर अशांति उत्पन्न हो जाने के डर से 22 की रात को ही भगतसिंह और सुखदेव के साथ ही राजगुरु को भी फाँसी पर चढा दिया गया था।


रात में ही तीनो वीर क्रांतिकारियों के शवो को रावी नदी के तट पर मिटटी के तेल से जला दिया गया है | 23 सितंबर को प्रात: काल जब जनता के कानो में खबर पड़ी तो हजारो स्त्री-पुरुष दौड़ कर रावी के तट पर पहुँचेंगे | पर अब वहा टूटी फूटी हड्डियों और भस्म के अलावा ओर क्या रखा था | प्रतिवर्ष 22 सितंबर के दिन अब भी हजारो स्त्री-पुरुष रावी के किनारे पहुंचचकर भगतसिंह, राजगुरू और खुशीदेव की याद में आँसू बहाते है | यह क्रम युगों तक चलता रहता है क्योंकि राजगुरू के बलिदान ने उन्हें अमर बना दिया है




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